शनिवार, 21 नवंबर 2009

सावधान ! आपके हाथ में है मौत का थैला .


हम और आप रोजाना अपनी जरुरत के सामान बाजार से लाने हेतु पोलीथिन बैग का उपयोग करते है । आज से तीन दशक पूर्व जब इसके प्रयोग में तेजी आई थी ,शायद हमें इस बात का अंदाज भी nahi था की आगे चलकर यही पोलीथिन हमारे लिए बड़ी समस्या ban जाईगी ।

आप और हम जिस महा नगर में निवास करते है वह आज पोलीथिन के दुष्प्रभाव से दम तोड़ रहा है ।

इसके किए जिम्मेदार हम आप और हम सबकी लापरवाही ही है ।


हमारी इस लापरवाही और अज्ञानता का सबसे अधिक खामियाजा मूक जानवर विशेषकर हमारी संस्कृति की प्रतिक गायो को भुगतना पड़ता है । हम अपने घर के कचरे को पोलीथिन में कर सड़क पर तोफेक देते है मगर हमें ये नही मालूम होता की खतरों से अनजान येजन्वर इन खाद्य सामग्रियो को खाने के दौरान पोलीथिन भी खा जाते है जो इनके आत में जाकर फस जाता है और जानवरों की मौत हो जातीहै।


इसके अतिरिक्त हमारे घरो में और व्यापारिक प्रतिष्ठानों से यही मुसीबत का थैला जब बहार निकलता है तब यह महानगर के पहले से ही जर्जर पड़े नालियों में जाकर अवरोधक का काम करता है और फ़िर शुरू होता है इस निर्जीव सेदिखने वाले पोलीथिन का सजीव तांडव , जल जमाव , जल बहाव में अवरोध और संक्रमित बीमारियो के रूप में । इसके आलावा कूड़े के ढेर में पड़े पोलीथिन जो कभी न सड़ने गलने के कारन वर्षो पड़ा रह कर प्रदुषण फैलता है को जला दिया जाता है और लोगो को लगता है की समाप्त हो गया पोलीथिन नाम का दुश्मन ,लेकिन क्या आपको ये पता है की पोलीथिन को जलने से जो गैस निकलती है वो ख़ुद इंसान के लिए कितनी खतरनाक होती है ,ये गैस अत्र शोध कैंसर और दमा जैसे जानलेवा बीमारिया फैलाती है ,


इन सब दुश्परिनामो को देखकर यदि ये कहा जाए की जिस पोलीथिन में आप सामान लेकर आते है वो मौत का ऐसा थैला है जो शायद आपको तो बक्श दे मगर पर्यावरण को जिस तरह दूषित कर रहा है वो आपके भावी पीढ़ी आपके बच्चे के लिये असमय मौत और विकलांगता भरे जीवन का आधार जरुर तैयार कर रहा है ।

फ़ैसला आपको करना है , आप अपनी पीढ़ी को बचाना चाहते है या बर्बाद करना ,यदि बचाना चाहते हो तो तय कीजिये आज से पोलीथिन का इस्तेमाल बंद । और यदि बर्बाद करना चाहते है तो निसंदेह उठा लीजिये मौत के इस थैले को जिसका नाम है पोलीथिन ।

--डा. दीप्ती

वाराणसी

सोमवार, 13 जुलाई 2009

Paper or plastic — what’s the greener choice?

Would you like paper or plastic? It's the question food shoppers are asked every day — a simple choice that even environmentally conscious shoppers at Whole Foods find confusing.
"I generally pick paper because it's more protective of the environment," one shopper tells us.
But all too often, convenience rules.
you caught me on a plastic day," another shopper says. "Now I feel guilty."But should she?
Consumers find themselves between a rock and a hard place when it comes to paper or plastic. To find out what is best to do in the grocery store, we turned to Allen Hershkowitz of the Natural Resources Defense Council.
"It depends on where you live," he says.
Plastic bags threaten wildlife along the coasts, so if that's where you call home, Hershkowitz says the choice should be paper. In the heartland, he says it's plastic.
"I just assumed paper was the better choice — more environmentally friendly choice," our guilty shopper says.
But people don't realize how big a footprint the paper industry has.
Here's how paper and plastic stack up side by side:
To make all the bags we use each year, it takes 14 million trees for paper and 12 million barrels of oil for plastic. The production of paper bags creates 70 percent more air pollution than plastic, but plastic bags create four times the solid waste — enough to fill the Empire State Building two and a half times. And they can last up to a thousand years.
Plastic, because it's cheaper to produce, is the overwhelming choice of grocery stores across the nation — the average family of four uses almost 1,500 of these a year. San Francisco is limiting consumers' freedom of choice, allowing only biodegradable plastic bags, which break down over months rather than hundreds of years.
For both types of bags, the environmentalist mantra is the same — reuse and recycle. But the best choice, they say, is cloth or canvas, and BYOB — bring your own bags.

सोमवार, 6 जुलाई 2009

Plastics - all kinds

Plastics - all kinds
I learnt today that sometimes remnants of plastic can be found even in breast milk! Of course it depends on the environment that the mother is in, probabaly one that is hugely affected by plastic pollution, like some beaches in Hawaii. But to imagine that the legacy of the plastics pollution has reached such levels! The first taste of life for a new born infant comes polluted.
The plastics problem doesn't just end with plastic bags. It is related to a lot of issues and generally with the way we human beings have built our lives and culture. There are other dangerous plastics pollution such as plastic bottles - the top spot going to the plastic water bottle that is widely available even in the most remote corners of India today.
It is true that the problem is bigger than us, but it is also true that we are of course the cause, eash one of us, one by one, with each plastic bag that we accept. Recycle is only a small part of the solution, this problem needs a paradigm shift. It is possible to shift towards habits, products and materials that are environment friendly. The Small Steps inititative is one example and we are indeed taking small steps all over the world as there are similar initatives being promoted in UK, USA and Australia.
The old and generic saying keeps coming back to me....A stitch in time...saves nine...
http://smallsteps.in/node/49

रविवार, 5 जुलाई 2009

मंगलवार, 26 मई 2009

ऐसा है प्लास्टिक

क्या आपको पता है प्लास्टिक बनने में जानवरों की हड्डियों का इस्तेमाल होता है
पूजा पाठ में प्लास्टिक का इस्तेमाल पूजा को खंडित करता है
पूजा का सामान आप उस पोलीथिन में लाते है जिसे बनने में हड्डियों का इस्तेमाल होता है
पोलीथिन के गिलास और कप में चाय या कोई गरम बस्तु खाने पिने से कैंसर हो जाता है
पोलीथिन वातावरण को प्रदूषित करता है और बीमारिया फैलाता है
आपका फेका पोलीथिन खाने से हर साल २२०० पशुओ की मौत हो जाती है
पोलीथिन से दुनिया में अनचाहे परमाणु विस्फोट का खतरा बना हुआ है क्योकि मिटटी में
दबा करोडो टन पोलीथिन से पृथ्वी के अन्दर जहरीली गैस का भंडार बन रहा है

गुरुवार, 21 मई 2009

एक प्रयास आपका ....

बनारस में पोलीथिन के उपयोगिता को कम और लगभग समाप्त कैसे किया जा सकता है ,

यह एक जटिल और काफी हद तक किसी सनकी आदमी का प्रश्न कहा जा सकता है ,लेकिन हम कुछ बनारसियों को लगता है ऐसा हो सकता है बसर्ते हम अपने शहर को किराये का घर न समझ कर उसे ख़ुद के पूर्वजो द्वारा बनाया गया एक घरौदा समझे जिसे उन्होंने हमारे लिए बनाया बसाया था ,जिस दिन हम ऐसा सोच लेगे उसी दिन हमें लगेगा की पोलीथिन में सामान लेने ले जाने का हमारा ये शौक हमारे शहर को की कदर दूषित कर रहा है और शायद आप पोलीथिन लेना बंद कर देगे ,लेकिन आज के दौर में हम अधिकतर काम पोलीथिन के इर्दगिर्द ही करते है जैसे घर का सामान लाना सब्जी लाना ,दूध तो पोलीथिन पैकेट में ही आता है बहुत से खाने पीने के सामान पोलीथिन में ही पैक कर आते है ,आख़िर कैसे बचा जाए इस पोलीथिन से ।

थोड़ा मुश्किल जरुर है लेकिन असंभव तो नही है कम से कम यदि झोले में सामान खरीदने की आदत आप डाल ले तो आपने बहुत हद तक अपने शहर को मनो पोलीथिन से बचा लिया ,और आपका घरौदा साफ सुंदर बना रहेगा । लेकिन फैशन के इस दौर में झोला लेकर बाजार जाकर कोई भला झोला छाप क्यो बनेगा ,अरे भाई अब तो ऐसे झोले बन रहे है जिसे आप लेकर चलना अपने लिये फैशन मानेगे और यकीनन ऐसे झोले यदि आप देख ले तो जरुर लेना चाहेगे ,निचे के तस्वीर में जो झोला या बैग आप जो भी कहे देख रहे है उसे एक sanstha द्वारा इस तरह बनाया गया है की इसे आप कमर में लटकाकर सेल फ़ोन की तरह रख सकते है और दुकान पे जाकर खोलेगे तो इसमे १० किलो से ज्यादा सामान आप भर लेगे और फिर घर में सामान रख कर इसे फिर से बेल्टवाले हुक में लटका लिया ,इसका उपयोग कर आप बहुत हद तक पोलीथिन से अपने घर को बचा सकते है ,आप चाहे तो इस झोले को ले सकते है ,हम आपको ये भी बता दे की ये झोला हम बेचते नही है बल्कि पोलीथिन त्यागने संकल्प लेने वाले को गिफ्ट में देते है और अपेक्षा करते है की वो यदि इसके बदले कोई सहयोग करना चाहते है तो जरुर करे क्योकि इस बैग के मध्यम से बनारस में महिलाओ को रोजगार मिला है । बैग को लेने के लिये आप Banaras2020@gmail.com पे संदेश भेज सकते है इस बैग के बारे में और अधिक जानकारी के लिये http://smallsteps।in/ पे लोग करे
दीप्ती सिंह --वाराणसी









सोमवार, 18 मई 2009

ये बनारस है

एक शहर है
कहते है इस शहर में कोई भी भूखा नही सोता
इस शहर में कोई मरता नही
क्योकि ,
इस शहर में यमराज को आना मना ही है ,
इस शहर में लोग ख़ुद से मोक्ष पाने चले आते है ,
कहते है यहाँ मरने पे स्वर्ग मिलता ।
इस शहर में लोग ३६५ दिन त्यौहार मनाते है और मस्ती करते है
दुःख यहाँ दीखता नही ,
सुख यहाँ टिकता नही
लेकिन ये शहर रुकता नही
हर गली में मन्दिर है ,हर मुहल्ले में मस्जिद
चारो छोर पे गिरिजा ,और गुरूद्वारे ।
कही पंजाब तो कही गुजरात ,कही बंगाल और महराष्ट्र, और कही मद्रास इस शहर में दीखता है
फैशन के दौर में भी, एक गमछे में ही ये शहर जी लेता है
इतना ही नही नही ये शहर भारत रत्तन भी देता है
फटी धोती और सफारी शूट एक ही दुकान पे चाय पिता है
इस शहर का नाम पूछने पे
कोई इसे काशी कोई वाराणसी और कई बनारस कहता है
लेकिन अपने शहर की परिभाषा हर आदमी कुछ यु बताता है

खाक भी जिस जमी का पारस है वो शहर हमारा बनारस है

--दीप्ती सिंह , वाराणसी

कैसा है बनारस

दुनिया का सबसे प्राचीन शहर बनारस अपनी विविधताओ के कारन सदा से ही लोगो में जिज्ञासा का कारन बना रहा है ,और शायद इसी लिये हर माह यहाँ लाखो देशी विदेशी लोग इस अलौकिक नगरी में छुपे अज्ञात रहस्य को जानने चले आते है ,कोई भी मौसम क्यो न हो यहाँ आने वालो की तादाद रूकती नही ,यहाँ की तंग गलियों संकरे रास्तो और उबड़ खाबड़ सडको पे लोगो का हुजूम हर दिन पहले से ज्यादा दिखाई देता है । धर्म ग्रंथो की माने तो बनारस कभी समाप्त होने वाला शहर नही है क्योकि ये भगवन शंकर के त्रिशूल पे टिकी हुई है मान्यताओ के अनुसार यहाँ मरने पे सीधा स्वर्ग मिलता है और यहाँ लगभग ८३ करोड़ देवता वास कारते है यहाँ यमराज को भी आना मना है बल्कि यहाँ यक्ष ,मौत के बाद आत्मा को स्वर्ग ले जाते है ।
ये बाते कितनी सच है ये तो नही मालूम लेकिन इस शहर के प्रति लोगो की आस्था देख भला कौन यह मानेगा की उपरोक्त बाते सच नही है ,।
बनारस में इतनी विविधताओ के बिच एक बात बहुत कचोटती है वो है यहाँ की गंदगी ,गंगा के प्रति लोगो में उदासीनता जिसके कारन ये शहर जहा गन्दगी का अम्बार बन गया है वही गंगा का पानी पिने को कौन कहे नहाने लायक नही रह गया है ,वो तो भला हो उन श्रधालुओ का जो गंगा में न सिर्फ़ नहाते है बल्कि गंगा जल अपने घरो में भी ले जाते है जिनसे गंगा की प्रसगिकता बनी हुए है । गंगा के घाट जिसके किनारे बैठ तुलसीदास ने रामचरित मानस लिख डाली ,जहा आकर शंकराचार्य भी यही के हो गए ,कबीरदास ने भक्ति का पाठ padahya ,भारतेंदु बाबु ने हिन्दी में खड़ी बोली की नीव डाली ,चंद्रशेखर आजाद ने आजादी की दुधुभी बजायी ,बिश्मिल्लाह खान ने शहनाई से सांप्रदायिक एकता का सुर सुनाया लेकिन आज का बनारस देख कर लगता नही की इसमे कुछ khas है ।
आख़िर बनारस के लोग अपने इस शहर को ऐसे pahchan क्यो देना chate है की bahar के लोग इसे गन्दगी के अम्बार वाला शहर pradhushit गंगा का शहर कहे ।

रविवार, 17 मई 2009

राम रमापति बैंक

वाराणसी, काशी या बनारस का नाम सुनते ही मन को एक अध्यात्मिक शांति सी महसूस होती है। यहाँ पर राम भक्तों का एक विचित्र किंतु सत्य ‘राम रमापति बैंक’ है, जहाँ राम के भक्तों को राम नाम का कर्ज दिया जाता है। लोग अपनी मन्नतें पूरी करने और अपने बिगड़े कामों को सफल बनाने के लिए राम नाम का कर्ज लेते हैं। इस बैंक की खासियत यह है कि यहाँ से किसी को रुपये पैसै नहीं वरन राम का नाम कर्ज के रूप में मिलता है।

राम भक्त यहाँ रामनवमी के दिन सवा लाख राम नाम का कर्ज लेता है लेता है और आठ महीने दस दिन तक प्रतिदिन (यानी 250 दिन तक ) 500 बार राम नाम लिखकर, उसे इसी बैंक में जमा कराता है। इस प्रक्रिया लखौरी कहलाती है। इस बैंक में अब तक 18 अरब से ऊपर राम नाम के रूप में जमा हो चुके हैं। यहाँ से कर्ज लेने वाले एक भक्त को सवा लाख बार राम का नाम लिखना पड़ता है, जिसके लिए उसे बैंक से राम नाम की मोहर लगा कागज, लकड़ी की कलम और लाल स्याही बैंक की तरफ से मुफ्त में दी जाती है। राम नाम लिखने के दौरान लिखने वाले भक्त को मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज व अशुद्ध और झूठा भोजन, मृत्युभोज के भोजन से लेकर किसी भी तरह के तामसिक भोजन से दूर रहना होता है। इस कर्ज को लेने वाले को कर्ज की निर्धारित तिथि पर ही पूरी करना पड़ती है। कर्ज पूरा होने के बाद राम नवमी के दिन इसी कर्ज को लेने का विशेष महत्व है। इस कर्ज को लेने के बाद कई लोगों ने शराब और माँस का तो हमेशा हमेशा के लिए त्याग किया ही लहसुन, प्याज भी छोड़ी दी।

इस बैंक की स्थापना 1926 में हुई थी, तब से अब तक लाखों भक्त बैंक से राम नाम का कर्ज ले चुके हैं और कर्ज चुकाने के बाद उनकी मन्नतें भी पूरी हुई है मजे की बात यह है कि विदेशी सैलानी भी इस बैंक से कर्ज लेते हैं और चुकाते भी हैं। इसकी कार्य प्रणाली एकदम किसी आधुनिक सरकारी या निजी बैंक जैसी है। इसमें कर्मचारी भी हैं, कर्ज का हिसाब-किताब भी रखा जाता है, और जमा धन से लेकर कर्ज लेने और चुकाने तक का हिसाब रखा जाता है।

बनारस विद्रोह

बनारस के शिवाला मोहल्ले में गंगा के घाट पर चेतसिंह का किला है , उसकी तहसील है और हमारे दल समाजवादी जनपरिषद का प्रान्तीय दफ़्तर की कोठरी भी । हमारे दफ़्तर जाने की गली में तीन उपेक्षित – सी कब्र हैं । ये कब्र पुरानी ईंटों की एक जर्जर हो रही दिवाल से घिरी हैं और उन पर अँग्रेजों द्वारा लगवाया गया शिलालेख है (चित्र देखें)। संयुक्त प्रान्त की सरकार ने १७ अगस्त , १७८१ को तीन अँग्रेजों समेत मारे गए उनके २०० सिपाहियों के दौरान-ड्यूटी मारे जाने का उल्लेख उक्त शिलालेख पर किया है। यह तीन कब्र हमें १८५७ से ७६ साल पहले हुए ‘बनारस-विद्रोह’ की याद दिलाते हैं। साहित्य-रसिक पाठक जयशंकर प्रसाद के कहानी गुण्डा याद कर सकते हैं।कहानी का नायक गुण्डा इसी विद्रोह में हिस्सा लेता है।[कोई साहित्यिक चिट्ठेकार इस कहानी को प्रस्तुत कर दे तो मजा आ जाए।] मोतीचन्द लिखित काशी का इतिहास ( विश्वविद्यालय प्रकाशन , चौक , वाराणसी ) में भी घटनाक्रम का विवरण है ।यहाँ पी. ई. रॉबर्ट्स के ‘हिस्टरी ऑफ़ ब्रिटिश इन्डिया’ , पृष्ट २०१ – २०८ से गुरुदर्शन सिंह द्वारा किए गए अनुवाद से तथ्य लिए गए हैं ।

१८वीं सदी के सातवें दशक में दक्षिण भारत में हैदर अली , मोहम्मद अली , मराठों और फ़्रान्सीसियों से लड़े गये युद्धों ने ब्रिटिश कम्पनी का खजाना निचोड़ डाला था। गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स कम्पनी के दिवालिएपन की स्थिति से ‘मुकाबला’ करने के लिए तरकीबें सोच रहा था ।

बनारस राज अवध के नवाब के अधीन था । १७७५ में बनारस – सन्धि हुई जिसके तहत बनारस-राज्य की जमीनें कम्पनी से पायी हुई मानी जाने लगीं । १७७८ में फ़्रांस से युद्ध छिड़ने पर हेस्टिंग्स ने राजा बनारस चेतसिंह के पहले से तयशुदा २२५ हजार पाउन्ड सालाना ख़िराज के अतिरिक्त २५ हजार पाउण्ड ऐंठने का मन बनाया। राजा ने कहा कि इतनी ज्यादा अतिरिक्त राशि की वसूली एक साल तक सीमित की जाए और इसे भी किश्तों में चुकाने दिया जाए। राजा ने ६ – ७ माह की मोहलत माँगी ।कम्पनी ने उसे पाँच दिन में रकम चुकाने का हुक्म दिया।

१७८० में ५ लाख अतिरिक्त रुपयों की माँग फिर की गयी । चेतसिंह ने एक विश्वासपात्र के हाथों २ लाख रुपए हेस्टिंग्स को कोलकाता बतौर रिश्वत भिजवाए ताकि अतिरिक्त वसूली न हो ।

इन वसूलियों के बावजूद हेस्टिंग्स ने राजा को खिराज वसूली से विमुक्त नहीं किया।अगली बार राजा को दो हजार घुड़सवार भेजने को कहा गया।इसका विरोध करने पर यह संख्या १ हजार कर दी गयी लेकिन राजा ने ५०० घुड़सवार और ५०० बन्दूकधारी भेजे ।हेस्टिंग्स ने इस गुस्ताखी की प्रतिक्रिया में ५० लाख रुपए का जुर्माना थोपने का मन बना लिया था। हेस्टिंग्स ने इस विषय में आगे कहा भी , ‘ मैं फैसला कर चुका था कि राजा के दुष्कर्मों के बदले में उससे धन निचोड़ कर इस धन का इस्तेमाल कम्पनी को उसके संकटों से राहत दिलाने में किया जाये। मैं इस पर भी संकल्पबद्ध था कि या तो राजा माफ़ किए जाने के बदले उससे विशाल धनराशि वसूली जाए या उसकी भीषण बचकानी हरकतों का उससे भीषण बदला लिया जाए । ‘

हेस्टिंग्स जुलाई १९७९ में कोलकाता से चला ।चेतसिंह उससे बतियाने भाग कर बक्सर आया और दीनहीन भाव से याचना करने लगा।हेस्टिंग्स ने बनारस पहुँचने के पहले जवाब देने से इनकार कर दिया। बनारस पहुँचने पर उससे मुलाकात नकार कर उसे याचना लिख कर देने को कहा गया।राजा के साथ हेस्टिंग्स के व्यवहार के मद्दे नजर राजा के उक्त पत्र को आदरयुक्त माना जाएगा लेकिन हेस्टिंग्स ने उस जवाब को न केवल अपर्याप्त बताया अपितु आक्रामक भी बताया।

हेस्टिंग्स की अपनी फौज काफ़ी कमजोर थी , फिर भी उसने राजा की गिरफ़्तारी का आदेश दे दिया।राजा ने बिना प्रतिकार गिरफ़्तारी दी लेकिन राजा की फौज उसे अपने ही राज में जलील होता देख बरदाश्त न कर सकी। जनता और चेतसिंह के सैनिकों ने ३ ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और ब्रिटिश सेना के २०० सैनिकों को मार डाला। इस हंगामे के दौरान चेतसिंह भाग निकला। हेस्टिंग्स भी जनता और बनारस के सैनिकों का तेवर भाँप कर चुनार की ओर भागा।

चेतसिंह अंग्रेज सैनिकों की हत्या से खुद को अन्जान बताता रहा और उसने ग्वालियर में शरण ली। [ चेतसिंह के ग्वालियर में शरण पाने के बारे में मुझे अपने अज्ञान के कारण विस्मय हुआ।विस्मय का कारण सुभद्राकुमारी चौहान की बचपन में कण्ठस्थ , यह पंक्तियाँ थीं ; 'अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी ।' मार्क्सवादी विचारक और इतिहासकार गुरुदर्शन सिंह ने स्पष्ट किया कि ग्वालियर रजवाड़ा पहले अंग्रेजों के खिलाफ़ था ,फिर चिंगुर कर मित्र बन गया। ]

चेतसिंह का राज-काज जब्त उसके भतीजे को सुपुर्द कर दिया गया। नये राजा को पहले से तयशुदा २२.५ लाख सालाना खिराज देने के बजाए ४० लाख रुपए सालाना खिराज कोलकाता भेजने का हुक्म हुआ।

बनारस के विद्रोह का १८५७ की क्रान्त की पृष्टभूमि में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाना चाहिए।

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१८५७ के आज़ादी के प्रथम समर तथा बहादुरशाह ज़फ़र पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का भाषण निरंतर-पत्रिका में पढ़ें ।

History of Varanasi

Mark Twain once very famously remarked that Benaras is older than history, older than tradition, older even than legend and looks twice as old with all of them put together. This is so very true for this quaintly charming land is indeed very old and takes pride in a History that dates back to 2500 years. The History of Varanasi begins with the settling of some Aryan tribes out here. They came from the north and made this land their home.

According to popular religious legend Lord Shiva made Varanasi his home after marrying Parvati. He did not leave the land ever since and consequently Varanasi emerged as an important pilgrim center for the Hindus, particularly the Shaivite Hindus.

Varanasi has been referred to time and again in the Indian epics Ramayana and Mahabharata as well as in the Buddhist Jataka tales. They are great pointers to its antiquity. History has it that Varanasi or Kashi, another name by which it is referred to was visited by Lord Buddha way back in 500 B.C. In fact it was on the outskirts of this city the Lord Buddha preached his first sermon after becoming “The Enlightened One”.
While reading the History of Varanasi, Uttar Pradesh one is sure to feel that it is a melting point of several cultures. Apart from its intimate association with Hinduism and Buddhism, it boasts of links with yet another religion – Jainism. The Jains revere this city very highly because three of their Tirthankaras were born here.

By virtue of lying on a very important trade route, Varanasi was also a very important center of trade and commerce in the 7th century. And if we are go to by the History of Varanasi from then on to the 15th century, we will know that is continued to flourish all along. In the 1400’s however the city was completely routed by the Afghans and it had to be totally rebuilt.

Actually on account of its enviable location and prosperity Varanasi was the target of many rulers. The list of Muslim rulers to have invaded Varanasi includes Mahmud of Ghazni, Mahmud of Ghori, Sultan Allaudin Khilji and Mughal Emperor Aurangzeb. As a result of these raids many temples and other ancient structures were destroyed. This is indeed very unfortunate but there is no denying that the History of this land flanked by the stretch of the sacred River Ganges continues to live. The History of Varanasi is narrated by the rare old manuscripts, the folk traditions and the people of Varanasi.

We come to know that Varanasi was the prime center of the Bhakti movement. Spear headed by the likes of Ramananda and Kabir, this devotional movement took place in the 15th century. The latter was highly respected by Hindus and Muslims alike. Tulsidas credited with the translation of the Ramayana from Sanskrit to Hindi belonged to Varanasi.

Varanasi is also home to the Benaras Hindu University and the Theosophical society. With so many stalwarts in the field of art, literature, craft and philosophy related to Varanasi coupled with it being the focal point of cultural activities it is but obvious that it will be labeled as the cultural capital of the country. History of Varanasi does show that it very much deserves this epithet.

काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण

यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण कैसे हुआ? बाद की पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार "वरणा' और "असि' नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। कनिधम १ भी इस मत की पुष्टि करते हैं, लेकिन एम. जूलियन ने इस मत के बारे में संदेह प्रकट किया था। २ उन्होंने "वरणा' का प्राचीन नाम ही "वरणासि' माना था पर इसके लिए उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया। विद्वानों ने इस मत की पुष्टि नहीं की, पर इस मत के पक्ष में बहुत से प्रमाण हैं।

अब हमें विचार करना पड़ेगा कि वाराणसी का उल्लेख साहित्य में कब से आया। काशी शब्द तो जैसा हम आगे देखेंगे सबसे पहले अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से आया है और इसके बाद शतपथ में। लेकिन यह संभव है कि नगर का नाम जनपद में पुराना हो। अथर्ववेद (४/७/१) में वरणावती नदी का नाम आया है और शायद इससे आधुनिक बरना का ही तात्पर्य हो। अस्सी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा है। काशी खंड में कहा है कि संसार के सभी तीर्थ असिसंभेद को षोड़शांश के बराबर नहीं होते और यहां स्नान करने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है। (काशीखण्ड त्रि.से. पृ. १६१)। इस तीर्थ के संबंध में इतना ही कहा गया है। पौराणिक साहित्य में असि नदी का नाम वाराणसी की व्युत्पत्ति की सार्थकता दिखलाने को आया है। (अग्नि पु. ३५२०)। यहां एक विचार करने की बात है कि अग्निपुराण में असि नदी को नासी भी कहा गया है। वस्तुत: इसमें एक काल्पनिक व्युत्पत्ति बनाने की प्रक्रिया दिख पड़ती है। वरणासि का पदच्छेद करके नासी नाम की नदी निकाली गयी है, लेकिन इसका असि रुप संभवत: और बाद में जाकर स्थिर हुआ। महाभारत ६/१०/३० तो इस बात की पुष्टि कर देता है कि वास्तव में बरना का प्राचीन नाम वाराणसी था और इसमें से दो नदियों के नाम निकालने की कल्पना बाद की है। पद्यपुराणांतर्गत काशी महात्म्य ३ में भी "वाराणसीति विख्यातां तन्मान निगदामि व: दक्षिणोत्तरयोर्नघोर्वरणासिश्च पूर्वत). जाऋवी पश्चिमेऽत्रापि पाशपाणिर्गणेश्वर:।।' (प.प.वि.मि. १७५) लिखा है अर्थात् दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी है, पूर्व में जाऋवी (गंगा) और पश्चिम में पाशपाणिगणेश। मत्स्यपुराण में शिव वाराणसी का वर्णन करते हुए कहते हैं -

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये।।

अर्थात्- हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों� से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा आता है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है। यहां अस्सी का उल्लेख नहीं है। वाराणसी क्षेत्र का विस्तार बताते हुए मत्स्यपुराण में एक और जगह कहा गया है-

वरणा च नदी यावद्यावच्छुष्कनदी तथा।
भीष्मयंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमन्ति के।।
(म.पु.कृ.क.त.पृ. ३९)

मत्स्यपुराण की मुद्रित प्रति में ""वाराणसी नदीमाय यावच्छुष्क नदी तवै'' ऐसा पाठ है। पुराणकार के अनुसार पूर्व से पश्चिम दो योजन या ढ़ाई योजन लम्बाई वरणा से असी तक है, और चौड़ाई अर्द्ध योजन भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक है अर्थात् चौड़ाई के तीन परिमाप बताये हैं। वास्तव में यहां कोई विशेष विरोधाभास नहीं है- वाराणसी क्षेत्र वरणा नदी से असी तक है, पर गंगा अर्द्धचंद्राकार होने के कारण सीमा निर्देश पूरा नहीं होता। भीष्मचंड़ी से पर्वतेश्वर तक इसका विस्तार आधा योजन हे। इनमें भिष्म चंड़ी, शैलपुत्री दुर्गा के दक्षिण में और पर्वतेश्वर सेंधिया घाट पर है। पद्मपुराण में तो स्पष्टत: चौड़ाई सदर बाजार स्थित पाशपाणिगणेश तक बताई है। वरणा संगम के आगे कोटवां गांव के पास का भाग गंगा तक लगभग ढ़ाई कोस है (जिसे पद्मपुराण ने ढ़ाई योजन बताया है)।

उक्त उद्धरणों सी जांच पड़ताल से यह पता चलता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ। अस्सी और बरणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया।

लेकिन प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम-से-कम पंतजलि के समय में अर्थात् ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र "यस्य आया:' (२/१/१६) पर पंतजलि ने भाष्य "अनुगङ्ग' वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं (कीलहार्न ६,३८०) से विदित है। मौर्य और शुंगयुग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है।

वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे जैसे कोशंब से कोशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो।

वाराणसी नाम से उक्त विवेचन से यह न समझ लेना चाहिए कि काशी की इस राजधानी का केवल एक ही नाम था। कम-से-कम बौद्ध साहित्य में तो इसके अनेक नाम मिलते हैं। उदय जातक में इसका नाम सुर्रूंधन (सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (सुन्दर नगर) (जा. ४/११९), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) (जा. ४/१५) मिलता है। इसे कासिनगर और कासिपुर के नाम से भी जानते थे (जातक, ५/५४, ६/१६५ धम्मपद अट्ठकथा, १/६७)। अशोक के समय में इसकी राजधानी का नाम पोतलि था (जा. ३/३९)। यह कहना कठिन है कि ये अलग-अलग उपनगरों के नाम है अथवा वाराणसी के ही भिन्न-भिन्न नाम है।

यह संभव है कि लोग नगरों की सुन्दरता तथा गुणों से आकर्षित होकर उसे भिन्न-भिन्न आदरार्थक नामों से पुकराते हो। पंतजलि के महाभाष्य से तो यही प्रकट होता है। अष्टाध्यायी के ४/३/७२ सूत्र के भाष्य में (कीलहार्न ७/२१३) "नवै तत्रेति तद् भूयाज्जित्वरीयदुपाचरेत्' श्लोक पर पंतजलि ने लिखा है- वणिजो वाराणसी जित्वरीत्युपाचरन्ति, अर्थात् ई. पू. दूसरी शताब्दी में व्यापारी लोग वाराणसी को जित्वरी नाम से पुकारते थे। जित्वरी का अर्थ है जयनशीला अर्थात् जहां पहुंचकर पूरी जय अर्थात् व्यापार में पूरा लाभ हो। जातकों में वाराणसी का क्षेत्र उस उपनगर को सम्मिलित कर बारह योजन बताया गया है- (जा. ४, ३७७, ५, १६०)। इस कथन की वास्तविकता का तो तभी पता चल सकता है जब प्राचीन वाराणसी और उसके उपनगरों की पूरी तौर से खुदाई हो पर बारह योजन एक रुढिगत अंक सा विदित होता है।



१. कनिंधम - एंशेट जियोग्राफी, पृ. १३१-१४०
२. एम. जूलियन - लाइफ एण्ड पिलिग्रेमेज आॅफ युवान च्वांड् ६, १३३, २, ३५४
३. शेकिंरग - पद्मपुराण ५/५८१ दि सेक्रिड सिटी आॅफ बनारस, लंडन, १८६८, पृ. १९

शुक्रवार, 15 मई 2009

ये बनारस है

एक शहर है

कहते है इस शहर में कोई भी भूखा नही सोता

इस शहर में कोई मरता नही

क्योकि ,

इस शहर में यमराज को आना मना ही है ,

इस शहर में लोग ख़ुद से मोक्ष पाने चले आते है ,

कहते है यहाँ मरने पे स्वर्ग मिलता ।

इस शहर में लोग ३६५ दिन त्यौहार मनाते है और मस्ती करते है

दुःख यहाँ दीखता नही ,

सुख यहाँ टिकता नही

लेकिन ये शहर रुकता नही

हर गली में मन्दिर है ,हर मुहल्ले में मस्जिद

चारो छोर पे गिरिजा ,और गुरूद्वारे ।

कही पंजाब तो कही गुजरात ,कही बंगाल और महराष्ट्र, और कही मद्रास इस शहर में दीखता है

फैशन के दौर में भी, एक गमछे में ही ये शहर जी लेता है

इतना ही नही नही ये शहर भारत रत्तन भी देता है

फटी धोती और सफारी शूट एक ही दुकान पे चाय पिता है

इस शहर का नाम पूछने पे

कोई इसे काशी कोई वाराणसी और कई बनारस कहता है

लेकिन अपने शहर की परिभाषा हर आदमी कुछ यु बताता है

खाक भी जिस जमी का पारस है वो शहर हमारा बनारस है